November 5, 2026 17:11:36

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धनत्रयोदशी के दिन किए जानेवाले यमदीपदान और स्वर्ण अथवा चांदी के नए पात्र क्रय करने का शास्त्र

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*धनत्रयोदशी के दिन किए जानेवाले यमदीपदान और स्वर्ण अथवा चांदी के नए पात्र क्रय करने का शास्त्र

शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण त्रयोदशी तथा विक्रम संवत अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी अर्थात `धनत्रयोदशी’ । इसी को साधारण बोलचाल की भाषा में `धनतेरस’ कहते हैं । इस दिन के विशेष महत्त्व का कारण यह दिन देवताओं के वैद्य धन्वंतरि की जयंती का दिन है ।

*धनत्रयोदशी के दिन यमदीपदान करने का अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व*

*अ. दीपदान से दीर्घ आयु की प्राप्ति होना* – दीप प्राणशक्ति एवं तेजस्वरूप शक्ति प्रदान करता है । दीपदान करने से व्यक्ति को तेज की प्राप्ति होती है । इस से उस की प्राणशक्ति में वृद्धि होती है और उ से दीर्घ आयु की प्राप्ति होती है ।

*आ. यमदेव के आशीर्वाद प्राप्त करना* – धनत्रयोदशी के दिन ब्रह्मांड में यमतरंगों के प्रवाह कार्यरत रहते हैं । इसलिए इस दिन यमदेवता से संबंधित सर्व विधियों के फलित होने की मात्रा अन्य दिनों की तुलना में ३० प्रतिशत अधिक होती है । धनत्रयोदशी के दिन संकल्प कर यमदेव के लिए दीप का दान करते हैं और उन के आशीर्वाद प्राप्त करते हैं ।

*इ. यमदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना* – यमदेव मृत्युलोक के अधिपति हैं । धनत्रयोदशी के दिन यमदेव का नरकपर आधिपत्य होता है । साथही विविध लोकों में होनेवाले अनिष्ट शक्तियों के संचारपर भी उन का नियंत्रण रहता है । धनत्रयोदशी के दिन यमदेव से प्रक्षेपित तरंगें विविध नरकोंतक पहुंचती हैं । इसी कारण धनत्रयोदशी के दिन नरक में विद्यमान अनिष्ट शक्तियोंद्वारा प्रक्षेपित तरंगें संयमित रहती हैं । परिणामस्वरूप पृथ्वीपर भी नरकतरंगों की मात्रा घटती है । इसीलिए धनत्रयोदशी के दिन यमदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उन का भावसहित पूजन एवं दीपदान करते हैं । दीपदान से यमदेव प्रसन्न होते हैं ।
संक्षेप में कहें तो, यमदीपदान करना अर्थात दीप के माध्यम से यमदेव को प्रसन्न कर अपमृत्यु के लिए कारणभूत कष्टदायक तरंगों से रक्षा के लिए उनसे प्रार्थना करना ।

*यमदीपदान की विधि हेतु आवश्यक सामग्री आर महत्त्व*

यमदीपदान विधि में नित्य पूजा की थाली में घिसा हुआ चंदन, पुष्प, हलदी, कुमकुम, अक्षत अर्थात अखंड चावल इत्यादि पूजासामग्री होनी चाहिए । साथही आचमन के लिए ताम्रपात्र, पंचपात्र, आचमनी ये वस्तुएं भी आवश्यक होती हैं । यमदीपदान करने के लिए हलदी मिलाकर गुंदे हुए गेहूं के आटे से बने विशेष दीप का उपयोग करते हैं ।

*पूजित दीप घर के बाहर दक्षिण दिशा में रखने के परिणाम*

दक्षिण दिशा यमतरंगों के लिए पोषक होती है अर्थात दक्षिण दिशा से यमतरंगें अधिक मात्रा में आकृष्ट एवं प्रक्षेपित होती हैं ।
दक्षिण दिशा से यमतरंगों का प्रवाह दीप की ओर आकृष्ट होता है । यमतरंगों का यह प्रवाह दीप के चारों ओर वलयांकित रूप में फैलता है । यमतरंगों के कारण कनिष्ठ प्रकार की अनिष्ट शक्तियां दूर हट जाती हैं । यमतरंगों के रूप में आए यमदेव के दर्शन हेतु स्थानदेवता एवं वास्तुदेवता भी तत्त्वरूप में उस स्थानपर आते हैं । इन देवताओं के आगमन के कारण वायुमंडल चैतन्यमय बनता है । वास्तु में रहनेवाले सभी सदस्यों को इस का लाभ होता है ।
इस प्रकार यमतरंगों के निकट आने के कारण धनत्रयोदशी के दिन दीप का पूजन कर उस का यमदेव के लिए किया दान उन्हें अल्पावधि में एवं सहजता से प्राप्त होता है । परिणामस्वरूप अपमृत्यु के लिए कारणभूत तरंगों से व्यक्ति की रक्षा होती है ।

*धनत्रयोदशी के दिन स्वर्ण अथवा चांदी के नए पात्र क्रय करने का शास्त्रीय कारण*
धनत्रयोदशी के दिन लक्ष्मीतत्त्व कार्यरत रहता है । इस दिन स्वर्ण अथवा चांदी के नए पात्र क्रय करने की कृतिद्वारा श्री लक्ष्मी के धनरूपी स्वरूप का आवाहन किया जाता है और कार्यरत लक्ष्मीतत्त्व को गति प्रदान की जाती है । इस से द्रव्य कोष में धनसंचय होने में सहायता मिलती है ।
यहां ध्यान रखनेयोग्य बात यह है कि, धनत्रयोदशी के दिन अपनी संपत्ति का लेखा-जोखा कर शेष संपत्ति ईश्वरीय अर्थात सत्कार्य के लिए अर्पित करने से धनलक्ष्मी अंततक रहती है ।

आपका विनम्र
श्री संजय कुमार सिंह
सनातन संस्था
संपर्क क्रमांक : 8470963863

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