अब 55 साल तक 15 जनवरी को ही मनेगी मकर संक्रांति, राशि के अनुसार करें दान; इससे करें परहेज
1 min read
मकर संक्रांति :
अब 55 साल तक 15 जनवरी को ही मनेगी मकर संक्रांति, राशि के अनुसार करें दान; इससे करें परहेज
ग्रहों के राजा सूर्य 15 जनवरी को धनु से मकर राशि में प्रवेश करेंगे। अब वर्ष 2080 तक मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनाई जाएगी। इसके बाद फिर ज्योतिषीय गणना के अनुसार मकर संक्रांति की तिथि एक दिन आगे बढ़ जाएगी। इस बार सूर्य का राशि परिवर्तन 14 जनवरी 2026 दिन बुधवार रात्रि 9.38 बजे हो रहा है। इसलिए, मकर संक्रांति की मान्यता अगले दिन 15 जनवरी उदया तिथि के अनुसार मानी जाएगी. इसलिए सभी प्रकार के दान पुण्य और पूजन पाठ 15 जनवरी की तिथि पर करने से ही फलदायी साबित होगा. विशेष पर्वों पर दिन का महत्व नहीं होता है. इसलिए, 15 जनवरी के दिन मकर संक्रांति मनाते हुए यानी खिचड़ी का पर्व मनाते हुए खिचड़ी का दान या सेवन किया जा सकता है इसके साथ ही खरमास समाप्त होगा और मांगलिक कार्य शुरू हो जाएंगे। इस बार वृद्धि योग, शुक्ल पक्ष द्वादशी तिथि और ज्येष्ठा नक्षत्र में गुरुवार (15 जनवरी) को मकर संक्रांति मनाई जाएगी। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा जाता है। ज्योतिषविद् आचार्य दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री ने बताया कि मकर संक्रांति के दिन साधारण नदी भी गंगा के समान पुण्यदायिनी हो जाती है।
ज्योतिषाचार्य पंडित वेद प्रकाश मिश्रा के मुताबिक, उदयातिथि के अनुसार मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनाई जाएगी. इसलिए इस पर्व का पुण्य काल 15 जनवरी को प्रात: काल सुबह 7 बजकर 15 से शुरू होकर सुबह 8 बजे तक रहेगा. आप चाहें तो सुबह 12 बजे तक भी पुण्य काल मना सकते हैं, जिसमें स्नान-दान, खिचड़ी का दान, तिल का दान और चावल का दान आसानी से कर सकते हैं.
ज्योतिषाचार्य नितिशा मल्होत्रा का भी मानना है कि 15 जनवरी को ही मकर संक्रांति मनाई जानी चाहिए.
मकर संक्रांति का समय उस समय से माना जाता है जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं. इस साल सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 14 जनवरी की रात्रि 9 बजकर 38 मिनट पर हो रहा है. ऐसे में यह संक्रांति रात के समय घटित होनी चाहिए. लेकिन, पंचांगों के अनुसार, यदि सूर्य का राशि परिवर्तन रात्रि में होता है तो उस समय मकर संक्रांति का पर्व नहीं मनाया जाता है. क्योंकि मकर संक्रांति सूर्य से जुड़ा पर्व है, इसलिए इसका निर्णय सूर्योदय के आधार पर किया जाता है. सूर्य उदय के बाद मिलने वाले आठ घंटों को ही संक्रांति काल माना जाता है और उसी अवधि में मकर संक्रांति का पर्व विधि-विधान से मनाया जाता है. यानी मकर संक्रांति 15 जनवरी को मनाई जानी चाहिए
मकर संक्रांति का पर्व 15 जनवरी को ही मनाया जाना चाहिए और इसका पुण्यकाल भी 15 जनवरी की प्रातः काल में ही रहेगा. खिचड़ी का दान भी इसी दिन शास्त्रसम्मत माना जाएगा.
वाराणसी के पंडितों का कहना है, “मकर संक्रांति का पर्व 15 जनवरी को ही मनाया जाना चाहिए और इसका पुण्यकाल भी 15 जनवरी की प्रातः काल में ही रहेगा. खिचड़ी का दान भी इसी दिन शास्त्रसम्मत माना जाएगा. काशी के बहुप्रसिद्ध काशी-ऋषिकेश पंचांग के अनुसार, 14 जनवरी की रात 9 बजकर 38 मिनट पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश करेंगे. काशी और प्रयाग क्षेत्र में पर्व और उत्सवों का निर्णय आज भी इसी पंचांग के आधार पर किया जाता है, इसलिए इसकी मान्यता पर संदेह का कोई कारण नहीं है.
शास्त्रों के अनुसार, मकर संक्रांति के बाद 40 घटी यानी लगभग 16 घंटे तक पुण्यकाल रहता है. यदि इस गणना को आधार बनाया जाए तो 14 जनवरी की रात संक्रांति होने के बाद भी पुण्यकाल 15 जनवरी की सुबह तक रहेगा. वहीं, शास्त्रों में यह भी बताया गया है कि इस दिन देवकार्य दोपहर 12 बजे तक ही किए जाते हैं और इस दिन पुण्यकाल का पालन प्रातःकाल में करना श्रेष्ठ माना गया है. इसी कारण 15 जनवरी को प्रातःकाल में मकर संक्रांति का स्नान-दान करना शास्त्रसम्मत होगा
72 साल में बदलती है तारीख
ज्योतिषविदों के अनुसार हर वर्ष सूर्य के राशि परिवर्तन में लगभग 20 मिनट का विलंब होता है। इस प्रकार तीन वर्षों में यह अंतर एक घंटे का हो जाता है। 72 वर्षों में 24 घंटे का फर्क आ जाता है। सूर्य और चंद्रमा ग्रह मार्गीय होते हैं, ये पीछे नहीं चलते। इसलिए तिथि में एक दिन की वृद्धि हो जाती है। इस लिहाज से वर्ष 2008 में ही 72 वर्ष पूरे हो गए थे। हालांकि छह वर्षों तक सूर्य का राशि परिवर्तन प्रातःकाल में होने से पूर्व काल मानते हुए मकर संक्रांति 15 जनवरी को ही मनाई जाती रही। इससे पहले सूर्य का राशि परिवर्तन संध्याकाल में होता था। वर्ष 1936 से मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाई जा रही थी। वहीं 1864 से 1936 तक 13 जनवरी और 1792 से 1864 तक 12 जनवरी को मकर संक्रांति मनाई जाती थी।
अब दूसरा कन्फ्यूजन है षटतिला एकादशी की वजह से जो 14 जनवरी को पड़ रही है. विष्णु पुराण के अनुसार, एकादशी के दिन चावल का सेवन ही नहीं, बल्कि उसका स्पर्श तक वर्जित माना गया है. ऐसे में इस दिन चावल की खिचड़ी बनाना या दान करना उचित नहीं है. वहीं, 15 जनवरी को द्वादशी तिथि है और शास्त्रों में द्वादशी के दिन चावल का दान और व्रत का पारण पुण्यकारी बताया गया है. इन सभी शास्त्रीय आधारों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि मकर संक्रांति का पुण्यकाल 15 जनवरी को ही रहेगा. चाहे प्राचीन पंचांग को आधार बनाया जाए या आधुनिक गणनाओं को, दोनों ही स्थितियों में पुण्यकाल 15 जनवरी की सुबह ब्रह्म मुहूर्त से लेकर कम से कम सुबह 7 बजकर 15 से 8 बजे तक रहेगा. भक्त चाहें तो इसे दोपहर 12 बजे तक भी मना सकते हैं.
इसलिए मकर संक्रांति को लेकर किसी भी प्रकार के भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है. शास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति का पर्व, स्नान और खिचड़ी दान 15 जनवरी को करना ही उचित और पुण्यकारी माना जाएगा.
मकर संक्रांति के स्नान को लेकर बने भ्रम पर साधु-संतों ने स्थिति स्पष्ट कर दी है. अखिल भारतीय दंडी स्वामी परिषद के अध्यक्ष स्वामी ब्रह्माश्रम ने कहा कि इस वर्ष मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी को नहीं, बल्कि 15 जनवरी को मनाया जाएगा और मकर संक्रांति का स्नान-दान भी इसी दिन होगा. उन्होंने बताया कि 14 जनवरी को एकादशी तिथि होने के कारण उस दिन चावल का सेवन और स्पर्श वर्जित माना गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी के दिन सभी पाप चावल में निवास करते हैं, इसलिए इस दिन चावल का प्रयोग वर्जित माना गया है.
स्वामी ब्रह्माश्रम ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल जगन्नाथपुरी में इस नियम से छूट है, जहां चावल से बना महाप्रसाद ग्रहण किया जाता है और वहां इसका दोष नहीं लगता है. 15 जनवरी को द्वादशी तिथि है. शास्त्रों के अनुसार, द्वादशी के दिन चावल का दान विशेष पुण्यकारी माना गया है. उन्होंने बताया कि 15 जनवरी को चावल, खिचड़ी, तिल और कंबल का दान करना शुभ रहेगा. इसी कारण मकर संक्रांति का पर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा. इस दिन स्नान-दान का शुभ मुहूर्त सुबह 4 बजे से लेकर दोपहर 3 बजे तक रहेगा.
राशि के अनुसार करें दान
मेष – लाल मिर्च, लाल वस्त्र और मसूर दाल।
वृषभ – सफेद तिल के लड्डू, चावल और चीनी।
मिथुन – हरी सब्जियां, मौसमी फल और साबुत मूंग।
कर्क – जरूरतमंदों को सफेद वस्त्र और घी।
सिंह – गुड़, चिक्की, शहद और मूंगफली।
कन्या – मूंग दाल की खिचड़ी बनाकर जरूरतमंदों को खिलाएं।
तुला – सफेद वस्त्र, मखाना, चावल और चीनी।
वृश्चिक – मूंगफली, गुड़ और लाल रंग के गर्म कपड़े।
धनु – पीले वस्त्र, केले, बेसन और चने की दाल।
मकर – काले तिल के लड्डू और कंबल।
कुंभ – ऊनी कपड़े, सरसों तेल और जूते-चप्पल।
मीन – पीली सरसों, चने की दाल और मौसमी फल।
